विनय के पद Chapter Question Answer | ICSE Sahitya Sagar

Amit Kumar
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 पदों पर आधारित प्रश्न

(i) ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं।। 
जो गति जोग विराग जतन करि नहिं पावन मुनि ज्ञानी। 
सो गति देत गीध सबरी कहूँ प्रभु न बहुत जिय जानी।। 
जो संपत्ति दस सीस अरप करि रावन सिव यह लीन्ही। 
सो संपदा-विभीषण कहँ अति सकुच सहित प्रभु दीन्ही ।। 
तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। 
तौ भजु राम, काम सब पूरन करै कृपानिधि तेरो ।।

(क) 'ऐसो को उदार जग माहीं' -- पंक्ति के आधार पर किसकी उदारता की बात की जा रही है? उनकी उदारता की क्या विशेषताएँ हैं ?

उत्तर: कवि तुलसीदास ने उपर्युक्त पद में अपने आराध्य देव श्रीराम की महिमा का गुणगान किया है। वे कहते हैं कि इस संसार में कोई अन्य श्रीराम के समान उदार नहीं है। वे कहते हैं कि श्रीराम के अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा नहीं है, जो दीन-दुखियों पर बिना सेवा किए हो दया करता हो।

(ख) 'गीध' और 'सबरी' कौन थे? राम ने उन्हें कब, कौन-सी गति प्रदान की?

उत्तर : 'गीध' से कवि का संकेत गिद्धराज जटायू से है और 'सबरी' अर्थात् शबरी एक बनवासी जाति शबर की महिला थी। श्रीराम ने गीध (जटायू) और शबरी (भीलनी) को वह परमगत्ति प्रदान की, जो गत्ति बड़े-बड़े मुनियों को योग और वैराग्य जैसे अनेक यत्न करने पर भी प्राप्त नहीं होती।

(ग) रावण ने कौन-सी संपत्ति किससे तथा किस प्रकार प्राप्त की थी? वह संपत्ति विभीषण को देते समय राम के हृदय में कौन-सा भाव था ?

उत्तर: रावण ने अपने दस सिर शिवजी को अर्पित करने के बाद लंका की संपत्ति प्राप्त की थी, परंतु श्रीराम ने
उसी संपत्ति को अत्यंत संकोच के साथ विभीषण को प्रदान कर दिया। 

(घ) तुलसीदास जी सब प्रकार के सुख प्राप्त करने के लिए किसका भजन करने को कह रहे हैं और क्यों ?

उत्तर: तुलसीदास जी कहते हैं कि हे मन! यदि तू सब प्रकार के सुख प्राप्त करना चाहता है, तो उन सभी को प्राप्ति श्रीराम की कृपा से ही संभव है, इसलिए तू राम का भजन कर। श्रीराम कृपा के सागर हैं, वे ही हमारी सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं।

(ii) जाके प्रिय न राम वैदेही।
तजिए ताहि कोटि वैरी सम जद्धि परम सनेही।
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितह्नि, भए-मुद मंगलकारी ।।
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।
अंजन कहाँ आँख जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं ।।
तुलसी सो सब भाँति परमहित, पूज्य प्रान ते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, ऐतो मतो हमारो ।।

(क) तुलसीदास किन्हें तथा क्यों त्यागने को कह रहे हैं ?

उत्तर : तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति को श्रीराम-सीता के प्रति अनुराग नहीं है, चाहे वह व्यक्ति अपना कितना ही प्रिय क्यों न हो, उसे परम शत्रु समझकर त्याग देना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिए क्योंकि राम-सीता से स्नेह रखने वाले का ही परमहित होता है।

(ख) उपर्युक्त पद के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि किस-किसने अपने किस-किस प्रियजन को छोड़ दिया ?

उत्तर : प्रहलाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु को, विभीषण ने अपने भाई रावण को, भरत ने अपनी माता कैकेयी को, राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य तथा ब्रज की गोपियों ने अपने-अपने पतियों को इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि ये सब ईश्वर-विरोधी थे।

(ग) 'अंजन कहाँ आँख जेहि फूटै' -- पंक्ति द्वारा तुलसीदास क्या सिद्ध करना चाहते हैं ?

उत्तर : तुलसीदास कहते हैं कि जिस प्रकार ऐसे अंजन की आँख में लगाने का कोई औचित्य नहीं है, जिसे लगाते ही आँख फूट जाए, उसी प्रकार उस व्यक्ति से भी संबंध रखने का कोई लाभ नहीं, जिसका राम के चरणों में स्नेह न हो क्योंकि ऐसा व्यक्ति लाभ के बजाए हानि ही पहुँचाएगा।

(घ) बलि के गुरु कौन थे? बलि ने अपने गुरु का परित्याग कब तथा क्यों कर दिया ?

उत्तर : राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य थे। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी थी। बलि ने उन्हें तीन पग भूमि देने का संकल्प किया। बलि के गुरु शुक्राचार्य को यह ज्ञात हो गया था कि वामन के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ही हैं। उन्होंने बलि को इसके प्रति सचेत करते हुए वामन को तीन पग भूमि न देने का आग्रह किया, पर बलि ने गुरु की यह आज्ञा न मानी और सहर्ष एक पग में पृथ्वीलोक, दूसरे पग में आकाशलोक और तीसरे पग में स्वयं को ही वामन को अर्पण कर दिया। इस प्रकार बलि ने अपने गुरु का परित्याग कर दिया था।

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